संतों की तपस्या से आज भी आलोकित है रामनगर भड़सरा का श्रीराम जानकी एवं बड़े हनुमान जी मंदिर


अगर आप अपने व्यवसाय, दुकान, शोरूम, संसथान इत्यादि के लिए शारदा प्रवाह न्यूज पोर्टल पर विज्ञापन देना चाहते हैं तो संम्पर्क करें - 9651636343, shardapravah@gmail.com, सविता ऑफसेट, रोडवेज तिराहा, जौनपुर

 शारदा प्रवाह पर आपको मिलेंगे जौनपुर एवं देश-दुनिया के ताज़ा समाचार


जौनपुर। उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक रूप से समृद्ध जनपद जौनपुर के रामनगर भड़सरा क्षेत्र में स्थित श्रीराम जानकी एवं बड़े हनुमान जी मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या, साधना और सनातन संत परंपरा की एक जीवंत धरोहर है। गोमती नदी और उसकी सहायक नदियों से सिंचित जौनपुर की पावन धरती पर स्थित यह सिद्ध पीठ लंबे समय से आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख केंद्र बनी हुई है।

इस पावन स्थल को महान संतों की कठोर साधना, अखंड भक्ति, त्याग और मंदिर से जुड़े पुजारियों की निष्ठावान सेवा ने निरंतर जीवंत बनाए रखा है। आज भी दूर-दराज से श्रद्धालु यहां दर्शन, आत्मिक शांति और आशीर्वाद की कामना लेकर पहुंचते हैं।

बाबा जानकी दास जी ने रखी थी मंदिर की नींव

लोकश्रुतियों और प्रचलित किंवदंतियों के अनुसार, इस पावन मंदिर की नींव श्री श्री 108 बाबा जानकी दास जी ने रखी थी। बताया जाता है कि एक बार बाबा जानकी दास जी इसी मार्ग से गुजर रहे थे। यात्रा के दौरान रात हो गई और चारों ओर अंधकार छा गया। उस समय यहां एक विशाल पीपल का वृक्ष हुआ करता था। बाबा ने उसी वृक्ष के नीचे रात्रि विश्राम किया।

लोकमान्यता है कि उसी रात्रि विश्राम के दौरान बाबा जानकी दास जी को प्रभु श्री हनुमान जी के दिव्य दर्शन हुए। इस आध्यात्मिक अनुभूति और प्रेरणा से उन्होंने इसी पावन स्थल पर मंदिर निर्माण का संकल्प लिया और मंदिर की स्थापना कराई।

आज भी महान संस्थापक संत बाबा जानकी दास जी की समाधि मंदिर परिसर में श्रद्धापूर्वक विराजमान है, जो भक्तों को उनकी तपस्या और आध्यात्मिक साधना की स्मृति कराती है।

श्री श्री 1008 शाहंशाह तपसी दास जी महाराज

साकेतवास : 1947

श्री श्री 1008 शाहंशाह तपसी दास जी महाराज इस सिद्ध पीठ की महान संत परंपरा के प्रमुख तपस्वी संतों में स्मरण किए जाते हैं। उन्होंने भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर अपना जीवन कठोर साधना, तपस्या और अनन्य ईश्वर आराधना को समर्पित कर दिया।

विषम परिस्थितियों के बीच उन्होंने इस पावन स्थल को अपनी तपस्थली बनाया। उनकी साधना, अखंड धुनी और आध्यात्मिक साधना ने रामनगर भड़सरा के इस मंदिर को विशिष्ट आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान की।

वर्ष 1947, जब देश स्वतंत्र हुआ, उसी वर्ष उनका साकेतवास हुआ। उनकी तपस्या और साधना की परंपरा आज भी इस पीठ की आध्यात्मिक विरासत के रूप में स्मरण की जाती है।

श्री श्री 1008 बाबा कमल दास जी महाराज

बाबा कमल दास जी महाराज उच्च कोटि के संत माने जाते थे। सरल स्वभाव, आध्यात्मिक ऊर्जा और दिव्य उपदेशों के माध्यम से उन्होंने शिष्यों एवं क्षेत्र के श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन किया। उनके सानिध्य में आने वाले श्रद्धालु आध्यात्मिक शांति और ईश्वरीय चेतना का अनुभव करते थे।

श्री श्री 1008 बाबा बजरंगदास जी महाराज

साकेतवास : 2002

बाबा बजरंगदास जी महाराज प्रखर तपस्वी, विद्वान एवं उच्च कोटि के सिद्ध संत के रूप में स्मरण किए जाते हैं। उन्हें अनेक भाषाओं का ज्ञान था तथा वेद, पुराण, मनुस्मृति, श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस और रामायण जैसे सनातन ग्रंथों का गहन एवं मर्मज्ञ ज्ञान रखते थे।

उनके प्रवचन और ग्रंथों की व्याख्या सुनने के लिए श्रद्धालुओं के साथ विद्वानजन भी उपस्थित होते थे। अद्भुत विद्वत्ता और आध्यात्मिक ज्ञान के बावजूद उनका स्वभाव अत्यंत सरल, सहज एवं विनम्र था।

उन्होंने अपना जीवन धर्म के प्रचार-प्रसार, समाज कल्याण, शिष्यों के मार्गदर्शन और आध्यात्मिक चेतना के विस्तार के लिए समर्पित किया। 108 वर्ष की दीर्घायु में उनका साकेतवास हुआ। उनकी तपस्या, विद्वत्ता और सरलता की स्मृतियां आज भी भक्तों के हृदय में जीवंत हैं।

बाबा मोहन दास जी महाराज

बाबा मोहन दास जी महाराज ने संत परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस पावन पीठ की निरंतर सेवा की। उन्होंने मंदिर की आध्यात्मिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने में योगदान दिया। उनका भी ब्रह्मलीन (साकेतवास) हो चुका है, किंतु उनकी सेवा और साधना के पदचिह्न आज भी इस पावन स्थल से जुड़े हुए हैं।

पुजारी अंजान दास जी महाराज

साकेतवास : 02 सितंबर 2026

पुजारी अंजान दास जी महाराज का संपूर्ण जीवन धर्म, सेवा, साधना और त्याग को समर्पित रहा। उन्होंने अपनी निष्ठावान एवं निष्काम सेवा से मंदिर की पूजा व्यवस्था, धार्मिक परंपराओं और दैनिक कार्यों को निरंतर सुचारू बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

02 सितंबर 2026 को उनके साकेतवास से क्षेत्र के श्रद्धालुओं और संत समाज में गहरा शोक व्याप्त हुआ। हालांकि उनकी निस्वार्थ सेवा, त्याग और धर्म के प्रति समर्पण की स्मृतियां सदैव अमर रहेंगी।

वर्तमान महंत श्री रामदास जी महाराज

वर्तमान में महंत श्री रामदास जी महाराज इस पावन पीठ की परंपरा और व्यवस्था का मार्गदर्शन कर रहे हैं। अपनी निष्ठा, धर्मपरायणता और सेवा-भाव के माध्यम से वे मंदिर की आध्यात्मिक एवं धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं तथा श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

पुजारी श्री अर्जुन दास जी

पुजारी श्री अर्जुन दास जी वर्तमान में मंदिर की दैनिक पूजा-अर्चना, देखरेख एवं धार्मिक अनुष्ठानों की व्यवस्था को निष्ठापूर्वक संभाल रहे हैं। उनकी समर्पित सेवा मंदिर की धार्मिक परंपराओं को निरंतर आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

संत परंपरा की जीवंत विरासत

इस पावन पीठ से जुड़े संतों में श्री बलरामदास जी महाराज, श्री शिवदास जी महाराज, श्री नारायणदास जी महाराज, श्री शिवपूजनदास जी महाराज एवं श्री रामेश्वरदास जी महाराज सहित अनेक संतों का योगदान स्मरणीय रहा है।

इन संतों ने अपने जीवनकाल में इस पीठ की गरिमा को बढ़ाया, निरंतर ईश्वराराधना की और अपनी तपस्या एवं साधना से क्षेत्र की आध्यात्मिक चेतना को मजबूत किया। उनकी साधना इस मंदिर की अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर है।

संतों की तपस्या ने बनाया आध्यात्मिक केंद्र

रामनगर भड़सरा स्थित श्रीराम जानकी एवं बड़े हनुमान जी मंदिर की पहचान केवल एक मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि संत परंपरा, तपस्या, त्याग और निस्वार्थ सेवा की जीवंत विरासत के रूप में बनी हुई है।

बाबा जानकी दास जी से लेकर विभिन्न संतों और पुजारियों तक, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही साधना और सेवा ने इस पावन स्थल की आध्यात्मिक गरिमा को बनाए रखा है। इन महान संतों का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए त्याग, धर्म, सेवा और मानव कल्याण की प्रेरणा देता रहेगा।

“सिया राममय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरि जुग पानी।”

जहां विराजें सियाराम और हनुमान,
वहीं रामनगर भड़सरा है पावन धाम।




शारदा प्रवाह

शारदा प्रवाह पर आपको मिलेंगे जौनपुर एवं देश-दुनिया के ताज़ा समाचार हिंदी मे.

एक टिप्पणी भेजें

Please Select Embedded Mode To Show The Comment System.*

और नया पुराने